ये बात मेरी है नहीं!

कुछ लफ़्ज़ों को लिखकर हम दराज़ में छोड़ देते हैं। लेकिन वो लफ्ज़ उनमें भी पड़े पड़े सांस भरते रहते हैं। ये कविता भी उन्हीं में से एक है। महीनों पहले जिसे कुछ शब्द दिए थे, और धीरे-धीरे शब्द जुड़ते गए और कविता बनती गयी।

एक पंछी है, जो बादलों के टुकड़ों में रहना चाहता है, और हमेशा उड़ते रहने को आतुर है, जिसकी व्यथा कहने जा रहा हूँ”

कहानियां दफ़्न करके छोड़ दी हैं,
राह उनकी मंज़िलो से मोड दी हैं,
मोड़ वो रस्ते दिए हैं, जो भी मुझतक आ रहे थे,
ला रहे थे साये ढेरों, पर न तुमको ला रहे थे।
छा रहा था ऐसा मंजर , जो न मुझको भा रहा था,
सब तो अच्छा लग रहा था, पर मन को वो दुखा रहा था।

लिखी गई कविताएं जितनी,चिताओं संग वो राख कर दी
मन में उमड़ी भावनाएं, कैद कर दीं, ख़ाक कर दीं।
मैं सफ़र में हूँ तभी तो, मेरा चलना लाज़मी है,
चुभ रहा आंखों में सबके, अब खटकने की कमी है।

टूटा तारा जब रातों में इक आवाज़ देता है,
मर मरकर जी लेने के वो राज़ देता है,
बड़ी नाज़ से थामा है जिनको अपने दामन में
अंगड़ाई तोड़े पंछी उस शज़र से साज़ देता है,
वही अरमां, वही ख्वाहिश लिए, उड़ना भी जरूरी है,
पंखों के अरमां के लिए शज़र से बिछड़ना भी जरूरी है।

मालूम नहीं मंज़िल का पता, जाए तो फिर कहां जाए,
दिशाएं सारी खो चुकी जब, लौटकर भी कहाँ आये।
सोचता है हवाओं से लिपट, डूब जाए आकाश में,
घोंसले से भागकर, रहे बादलों के पाश में।
थक गया है, तिनका तिनका घर बनाने में,
और बारिशें भी न हारी, उसको हराने में,
घास के तिनकों को हटा दे शज़र से कोई,
और बच के निकल जाए, नज़र से हर कोई,
वो अब बस कराहता है,
वो बस इतना चाहता है,
इस सियासी दौर में चिट्ठी लिखे कोई,
ख्वाहिशों से सने हाथों को अब मिट्टी लिखे कोई।
कहानियों और किस्सों का, सफ़र फिर से शुरू न हो,
हो भी जाये ऐसा अगर, तो किस्सा हु ब हु न हो,
मिले उससे जब भी, तो लगे खुद का संग पाया,
दर्द नासूर बन बैठा, इश्क़ तब जा के रंग लाया।

जिसकी ख़ातिर उसको सफ़र से लौट आना है,
बीत जाए उम्र सारी, पर उसको चाहना है,
साथ होकर मुनाफ़ा न भी हो, ख़सारा ही मिल जाये,
टूटे कभी जो हौंसला, तो सहारा ही मिल जाये।

चारों दिशाएं घूमकर, लौट के आया वो घर,
कभी अर्श पर, कभी फर्श पर, सफ़र उसका हुआ सिफ़र
अब जब सब कहें संवर संवर तो दिल कहे बिखर बिखर।
कोई हो रास्ता, जाए जिधर, कोई हो हमसफ़र, कोई रहगुज़र।

ग़र मैं कहूँ, मैं ही हूँ पंछी वही,
भरोसा करो? नहीं नहीं!!
अरे नहीं, मैं वो नहीं,
और ये बात मेरी है नहीं!
नहीं नहीं! बिल्कुल नहीं।

मैं तो बस यही कहूँ,
संग मेरे चले भी वो, जलूँ मैं तो जले भी वो,
साथ मे हम राख हों, साथ में हम ख़ाक हों,
आरज़ू यही रहे-
मैं कहूँ सफ़र सफ़र, वो संग हो डगर डगर,
संग जीत भी, संग हार भी,
संग प्रीत भी, संग खार भी,
कुछ यूं हो वो संग मेरे,
इस ओर भी, उस पार भी।

ग़र मैं कहूँ, मैं ही हूँ पंछी वही,
भरोसा करो? नहीं नहीं!!
अरे नहीं, मैं वो नहीं,
और ये बात मेरी है नहीं!
नहीं नहीं! बिल्कुल नहीं! बिल्कुल नहीं!

विशाल स्वरूप ठाकुर

तुकबंदी

यादों को वक़्त का तकाज़ा कहाँ है,
ज़ख्म गहरा है, ज़ख्म ताज़ा कहाँ है,
मैं बस चल रहा हूँ, रास्तों के सायों पर,
साये रास्ता नहीं हैं, ये अन्दाज़ा कहाँ है।

निगाहों की सुनो, न फिजाओं की सुनो,
अदब का शहर है, अबके राहों की सुनो,
प्रेम, मोहब्बत, इश्क़ बुझदिली है ‘विशाल’
मुफ़लिसी की धूप है, ज़रा सायों की सुनो।

बहकती निगाहों की रज़ा बता दो,
जो हो रही फिर से तो ख़ता बता दो,
होने लगा ऐतबार मोहब्बत मेंं फिर से,
मिलेगा किस मोड़ पे, पता बता दो।

(अंताक्षरी के कुछ अंश)

अधूरी मोहब्बत

जिन लोगो की मोहब्बत पूरी न हो परिवार के लोग सपोर्ट न करे और बिछड़ जाए तो उसमें गलती किसकी है लड़की या लड़के की?


इतना बृहत शीर्षक देने के लिए रूपेश जी को साधुवाद। इस विषय पर जितना लिखा जाए उतना कम है, और इसे दो शब्दों में लिखा जाए तो – फ़क ऑफ

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कुछ नहीं कर पाऊंगा…

“जब पूरे शहर में बरसात हो, और आपके दिल का कोई कोना आज भी प्यासा हो, तो न उस शहर का कोई मतलब रह जाता है, न बरसात का। कल्पवृक्ष की कॉफी हो, या SRC की चाय, सब फ़ीके फ़ीके हैं।” ये बरसात जो कभी मिलने पर हुआ करती थी, अब सिर्फ यमुना और टोंस की प्यास बुझाने मात्र की रह चुकी है। बिरसनी के जंगलों की सड़कें, पौंधा के महंगे रिज़ॉर्ट, बिधौली के कैफ़े, अब खुशी नहीं देते, ये इसलिए हैं भी नहीं।बस इनसे होकर गुज़र जाता हूँ, जैसे कई शख्स नज़रों से होकर गुज़र जाते हैं। अब समय अपना नहीं रहा, सब बदल चुका है, ये सड़कें, ये गालियां, ये पगडंडियां, जंगल, नदियां, कोई भी नहीं पहचानता है। मैं कहता हूं, मैं हूँ, तो आवाज़ आती है कि अब होना न होना कोई महत्व नहीं रखता, दुनिया आगे बढ़ चुकी है, तुम्हें भी यहां से लौटते हुए किसी ओर रास्ते को आगे बढ़ जाना चाहिए। गाड़ी मुड़ती है, किसी और रास्ते पर बढ़ती है, कहीं दूर निकल जाती है। मैं, जो वास्तविक मैं हूँ, वहीं खड़ा हूँ, प्रकृति को पा लेना चाहता हूँ। यह भूलते हुए कि प्रकृति की प्रवृत्ति बदल चुकी है। मैं स्तब्ध हूँ, ऐसा महसूस हो रहा है कि करीब होने की उम्मीद में दूरियों का दानव मुझे निगल रहा है, मुस्कराहटों का पुलिंदा किसी मोम सा हो पिघल रहा है। मैं कुछ नहीं कर पा रहा हूँ, मैं कुछ नहीं कर पाया था, मैं कुछ भी नहीं कर पाऊंगा, रास्ते चले जायेंगे, मैं वहीं रह जाऊंगा।


विशाल स्वरूप ठाकुर

“सब कुछ कितना बेहतर है ना!

“सब कुछ कितना बेहतर है ना! बरसात के बाद जब सूर्य की लालिमा किसी फूल पर बिखरती है तो उसका रोम रोम चमक उठता है।”पहाड़ों की मुड़ी मुड़ी सड़कों से गुजरते हुए, गाड़ी के शीशे पर जमी भाप को पोंछते हुए यह सब कुछ स्पष्ट हुआ। डेक पर चाय रखी, और कोटी मिसरास के सड़क के अंतिम छोर से देहरादून को देखा।शाम से यहीं हूँ, खुद की तलाश में। मेरे एक ओर चीड़ के पेड़ों का जंगल और दूसरी तरफ साल का! और बीचों बीच सड़क और उसपर मैं, नितांत अकेला!शाम में नज़रों को फैलाव देते हुए जब वहां से देहरादून देखा तो कुछ अलग दिखा!शुरुआत साल के पेड़ों से होते हुए, दूर दूर तक बसे घर, फिर शाम को जगमगाती शहर की सड़कें, दूर कहीं टोंस नदी की श्वेत रेखीय भंगिमा, और हिमालय की लाडली बेटियां-शिवालिक पहाड़ियां… इसके बाद जो कुछ है, वो दिख नहीं सकता, क्योंकि इसके बाद देहरादून नहीं है, इसके बाद खूबसूरती नहीं है।अब रात हो चुकी है, बादल गरज रहे हैं, हवाएं ठंडी हैं, बारिश फिर से होने को है और शहर की भागदौड़ से दूर एक सुकून है, जिसमें मेरे साथ सिर्फ मैं हूँ, शहर की खूबसूरती को ऊंचाइयों से आँकते हुए अकेला हूँ। यह समझ रहा हूँ कि ऊंचाईयों पर जाकर अकेला होना है, सुकून की तलाश में जाना है तो अकेला होना है, खुद से साक्षात्कार करना है तो अकेला होना है। जीवन का रहस्य इसी अकेलेपन में है।मैं इस रहस्य की खोज कर चुका हूँ।


विशाल स्वरूप ठाकुर

मैं कोरोना बोल रहा हूँ।

“…आप अपने मन के कोरोना को भी मेरे साथ उन तालियों की गड़गड़ाहट में मार दें। जब भी आपको लगे की देश दुनिया में मैं फिर से मर चुका हूं, तब घर से निकलना, सड़कों पर मर रहे बच्चों से दो मिनट प्यार से बात कर लेना, किसी रोते हुए हंसा देना, जैसे मैंने धरती हो हंसाया है। किसी गरीब, विकलांग की मदद के लिए आगे आ जाना…”

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“बातों से मसअले हल होते हैं”

आदमी को बोलने से इतने नुकसान नहीं होते, जितने कभी कभी चुप रहने से हो जाते हैं और कभी कभी यूँ भी होता है कि जहां चुप रह जाना चाहिए वहां बोलकर बात और बिगड़ जाती है। दोनों ही बातें असमंजस की हैं और एक दूसरे की विरोधी भी। इस अंतर्विरोध में पिसता वही है जो बात के होने और न होने की सही टाइमिंग को नहीं समझ पाता।

वार्तालाप और बात दोनों अलग अलग चीजें हैं। वार्तालाप होगा तो बात होगी ही होगी लेकिन बात हो तो जरूरी नहीं की वार्तालाप हो ही!कुंदन और ज़ोया के बीच अब वार्तालाप नहीं होता! होता भी है तो बहुत कम, बात होती है। कभी कभी उस बहुत कम हुए वार्तालाप में या सिर्फ ज़ोया की तस्वीरों या यादों से, उन क्षणिक लम्हों से, जिनमें कुंदन ज़ोया के साथ दो चार कदम चला, और फिर उसके ख्यालों में सफर काटने के बाद दिल्ली पहुंच गया।

कुंदन के पास कुछ भेजे गए और कुछ नहीं भेजे गए पत्रों के अलावा सिर्फ कुछ स्मृतियों की कड़ियाँ शेष मात्र हैं। जिनके सहारे एक लंबा समय काटा जा सकता है, इतना समय कि जिसे एक जिंदगी कहा जा सकता है।

कभी कभी लगता है कुंदन झूठ के पुलिंदे पर कुछ पहेलियां सुलझाने में लगा हुआ, अपनी ही बात पर कायम नहीं रहा है कुंदन। जब उसने सारे पत्रों को समेटा तो मालूम हुआ कि 60 पत्र भी ठीक से पूरे नहीं हैं जो ज़ोया को भेजे हैं, बीस एक पत्र ऐसे रहे जो लिखे लेकिन भेजे नहीं। भेजे क्यों नहीं, ये मालूम नहीं। पहेलियां सुलझाने में खुद कितना उलझ गया था कुंदन कि वह खुद नहीं जानता। ज़ोया को पत्र लिखना खुद से साक्षात्कार कर लेना है। जब भी कुंदन ज़ोया को कुछ लिखता है तो खुद से मिल जाता है। और लिखता भी क्या ही है, उलझनें, परेशानियां, झिझक और न जाने क्या क्या।

जब उसने पत्रों को फिर से पढ़ा तो समझ आया कि ज़ोया को कुंदन की तरफ से परेशानियों और उलझनों के अलावा पहुंचा ही क्या था!”बातों से मसअले हल होते हैं”, और ये मसअले किसके? कुंदन के! और ज़ोया का क्या?

कुंदन पूरी कहानी में अपनी ही अपनी कह गया और मुरारी से सवाल करता रहा।जो बातें कभी रांझणा की हुआ करती थीं, अब सिर्फ कुंदन और ज़ोया की बातें रह गयी हैं।

ज़ोया कुछ भूल गयी थी! ज़ोया को इसकी सुध नहीं! शायद ज़ोया कुछ भूल गयी थी। खैर, भूलना इतना भी बुरा नहीं है, और प्रेम कोई परीक्षा तो है नहीं, जो भूलने से नम्बर कट जाएंगे। परीक्षा होती तो कुंदन खुद याद दिला देता, ज़ोया को पास कराने के लिए। अब ज़ोया क्या भूली, ये ज़ोया जाने!

पहले कुंदन एक तरफा अनुमान लगाए जाता था, और फिर किसी निष्कर्ष पर पहुंचता था, जो अमूमन गलत होता था। अब चीज़ों को वैसे ही समझ लेता है, जैसी वो होती हैं। वो हर बात की अनेक संभावनाएं तलाशते हुए, सबसे खूबसूरत संभावना को संजोते हुए मुस्कराते हुए सो जाता है।

हर कहानी में कोई दिलचस्प मोड़ आता है, या कोई अनहोनी होती है! दिल धक्क से बैठ जाता है! काश ऐसा न होता! काश कहानी और बढ़ती, काश ये किरदार अभी और रहता कहानी में! और इस काश में कहानी खत्म हो जाती है! और हाथ में किताब के अलावा कुछ बचता है तो वो होता है – अफ़सोस, यही अफ़सोस किसी गठजोड़ का काम करता है।

कहानियां बड़ी दिलचस्प होती हैं। पहले पन्ने से आखिरी पन्ने तक जोड़े रखती हैं। खासकर के उस व्यक्ति को जो टूट चुका है। जिसे अब जीने में भी दिलचस्पी नहीं बची है, और न ही वो जीने की कोई संभावना ही तलाश रहा है। कहानियां खुद से साक्षात्कार करवाती हुई खत्म हो जाती हैं, और अपनी केंचुल छोड़ती हुई उस टूटे व्यक्ति के अंतर्मन को जोड़ देती हैं, जिसके लिए कोई संभावना बाकी न थी।कुंदन भी ऐसे ही टूट चुका था। ज़ोया को इसकी सुध नहीं! शायद ज़ोया कुछ भूल गयी थी। खैर, भूलना इतना भी बुरा नहीं है, और प्रेम कोई परीक्षा तो है नहीं, जो भूलने से नम्बर कट जाएंगे। परीक्षा होती तो कुंदन खुद याद दिला देता, ज़ोया को पास कराने के लिए। अब ज़ोया क्या भूली, ये ज़ोया जाने!अगर बातें हो जाती तो मसअला ही न रहता। “बातों से मसअले हल होते हैं।

अगर लेख अच्छा लगा हो तो कुंदन को

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7210523847

इससे कुंदन ज़ोया को कोस्टा कॉफी ले जा सकता है, और बातचीत कर सकता है, क्योंकि ये उसी की कहानी है।

विशाल स्वरूप ठाकुर